सपा-बसपा 'गठबंधन' को कांग्रेस की कितनी ज़रूरत?
उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों की एकता यानी महागठबंधन की तस्वीर को लेकर एक बार फिर अटकलें शुरू हो गई हैं. इन चर्चाओं का मुख्य मुद्दा ये है कि गठबंधन कांग्रेस के साथ होगा या फिर बिना कांग्रेस के.
जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो विधानसभा चुनाव के उत्साहित नतीजों के बावजूद वो यही संकेत दे रही है कि राज्य में बीजेपी को हराने के लिए पार्टी सपा और बसपा के अलावा कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन करके ही चुनाव लड़ना चाहती है लेकिन तीन राज्यों में कांग्रेस सरकारों के शपथ ग्रहण समारोह में समाजवादी पार्टी -बहुजन समाज पार्टी की ग़ैर मौजूदगी ने ऐसी अटकलों को हवा दी है.
इस घटनाक्रम के बाद ये चर्चा गर्म हो गई कि सपा और बसपा कांग्रेस पार्टी को गठबंधन में नहीं रखेंगी और इन दोनों दलों के बीच सीटों का तालमेल भी लगभग हो चुका है. लेकिन सपा और बसपा, दोनों ही दलों के नेताओं ने ऐसे किसी समझौते की बात से इनकार किया है. ख़ुद अखिलेश यादव भी ऐसी अटकलों को ख़ारिज कर चुके हैं.
गठबंधन की उलझी तस्वीर
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बाद मिली करारी पराजय की वजह से फूंक-फूंककर क़दम रख रही है. पार्टी का मानना है कि उसे गठबंधन में जितनी सीटें मिलने की संभावना है, उससे ज़्यादा सीटें वो अकेले ही लड़कर जीत सकती है.
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र मदान कहते हैं कि फ़िलहाल उनकी पार्टी राज्य की सभी अस्सी सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है लेकिन यदि आलाकमान गठबंधन के बारे में कोई निर्देश देता है तो राज्य इकाई उसे ज़रूर मानेगी.
दरअसल, सपा नेता अखिलेश यादव कांग्रेस को लेकर उतने आक्रामक अब तक नहीं दिखे हैं लेकिन बीएसपी नेता मायावती अपने विरोधी के रूप में कांग्रेस को बीजेपी के बराबर रखने में सार्वजनिक तौर पर भी कभी कोताही नहीं करती हैं.
तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब कांग्रेस पार्टी के साथ उनका गठबंधन टूट गया था तो उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया था कि कांग्रेस छोटी पार्टियों को ख़त्म करना चाहती है. हालांकि मायावती ने राहुल और सोनिया के प्रति नरमी दिखाते हुए गठबंधन के रास्ते को पूरी तरह से बंद भी नहीं किया था.
गठबंधन से कांग्रेस को फ़ायदा या नुकसान?
कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीएसपी के साथ गठबंधन नहीं किया, बावजूद इसके उसे इन राज्यों में जीत हासिल हुई. हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि कांग्रेस ने बीएसपी और सपा को भी साथ में लिया होता तो परिणाम इससे भी बेहतर हो सकते थे. लेकिन इन राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस पार्टी में गठबंधन को लेकर वो उत्सुकता नहीं है जैसी कि पहले थी.
ऐसा माना जा रहा है कि गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को सपा और बसपा की ओर से अधिकतम दस सीटें दी जा रही हैं. जबकि पार्टी की रणनीति ये है कि वो अपने बड़े और प्रभावी नेताओं को उनके क्षेत्रों से लड़ाने की तैयारी कर रही है. ऐसी स्थिति में उसे इस बात की पूरी उम्मीद है कि वो गठबंधन की तुलना में अकेले लड़कर ज़्यादा सीटें पा सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि सीटों के अलावा कांग्रेस को अकेले लड़ने में और भी फ़ायदे नज़र आ रहे हैं, "एक तो हर लोकसभा सीट पर उसे एक नेता मिल जाएगा, दूसरे पार्टी लोकसभा चुनाव के बहाने अपने संगठन को एक बार फिर खड़ा करने की कोशिश कर सकती है. गठबंधन की स्थिति में तो उसे बहुत कम सीटें मिलेंगी और संगठन भी वहीं रह पाएगा, पूरे राज्य में नहीं."
जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो विधानसभा चुनाव के उत्साहित नतीजों के बावजूद वो यही संकेत दे रही है कि राज्य में बीजेपी को हराने के लिए पार्टी सपा और बसपा के अलावा कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन करके ही चुनाव लड़ना चाहती है लेकिन तीन राज्यों में कांग्रेस सरकारों के शपथ ग्रहण समारोह में समाजवादी पार्टी -बहुजन समाज पार्टी की ग़ैर मौजूदगी ने ऐसी अटकलों को हवा दी है.
इस घटनाक्रम के बाद ये चर्चा गर्म हो गई कि सपा और बसपा कांग्रेस पार्टी को गठबंधन में नहीं रखेंगी और इन दोनों दलों के बीच सीटों का तालमेल भी लगभग हो चुका है. लेकिन सपा और बसपा, दोनों ही दलों के नेताओं ने ऐसे किसी समझौते की बात से इनकार किया है. ख़ुद अखिलेश यादव भी ऐसी अटकलों को ख़ारिज कर चुके हैं.
गठबंधन की उलझी तस्वीर
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बाद मिली करारी पराजय की वजह से फूंक-फूंककर क़दम रख रही है. पार्टी का मानना है कि उसे गठबंधन में जितनी सीटें मिलने की संभावना है, उससे ज़्यादा सीटें वो अकेले ही लड़कर जीत सकती है.
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र मदान कहते हैं कि फ़िलहाल उनकी पार्टी राज्य की सभी अस्सी सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है लेकिन यदि आलाकमान गठबंधन के बारे में कोई निर्देश देता है तो राज्य इकाई उसे ज़रूर मानेगी.
दरअसल, सपा नेता अखिलेश यादव कांग्रेस को लेकर उतने आक्रामक अब तक नहीं दिखे हैं लेकिन बीएसपी नेता मायावती अपने विरोधी के रूप में कांग्रेस को बीजेपी के बराबर रखने में सार्वजनिक तौर पर भी कभी कोताही नहीं करती हैं.
तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब कांग्रेस पार्टी के साथ उनका गठबंधन टूट गया था तो उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया था कि कांग्रेस छोटी पार्टियों को ख़त्म करना चाहती है. हालांकि मायावती ने राहुल और सोनिया के प्रति नरमी दिखाते हुए गठबंधन के रास्ते को पूरी तरह से बंद भी नहीं किया था.
गठबंधन से कांग्रेस को फ़ायदा या नुकसान?
कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीएसपी के साथ गठबंधन नहीं किया, बावजूद इसके उसे इन राज्यों में जीत हासिल हुई. हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि कांग्रेस ने बीएसपी और सपा को भी साथ में लिया होता तो परिणाम इससे भी बेहतर हो सकते थे. लेकिन इन राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस पार्टी में गठबंधन को लेकर वो उत्सुकता नहीं है जैसी कि पहले थी.
ऐसा माना जा रहा है कि गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को सपा और बसपा की ओर से अधिकतम दस सीटें दी जा रही हैं. जबकि पार्टी की रणनीति ये है कि वो अपने बड़े और प्रभावी नेताओं को उनके क्षेत्रों से लड़ाने की तैयारी कर रही है. ऐसी स्थिति में उसे इस बात की पूरी उम्मीद है कि वो गठबंधन की तुलना में अकेले लड़कर ज़्यादा सीटें पा सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि सीटों के अलावा कांग्रेस को अकेले लड़ने में और भी फ़ायदे नज़र आ रहे हैं, "एक तो हर लोकसभा सीट पर उसे एक नेता मिल जाएगा, दूसरे पार्टी लोकसभा चुनाव के बहाने अपने संगठन को एक बार फिर खड़ा करने की कोशिश कर सकती है. गठबंधन की स्थिति में तो उसे बहुत कम सीटें मिलेंगी और संगठन भी वहीं रह पाएगा, पूरे राज्य में नहीं."
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